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Friday, January 13, 2017

धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं.!

एक बेटे ने पिता से पूछा :
पापा ये 'सफल जीवन' क्या होता है ?

पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए। 
बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था...

थोड़ी देर बाद बेटा बोला ;
पापा.. ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !!  ये और ऊपर चली जाएगी...

पिता ने धागा तोड़ दिया ..

पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आइ और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...।

तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया :
बेटा..
'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं...
  जैसे :
            घर,
          परिवार,
        अनुशासन,
        माता-पिता,
         गुरू आदि
और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...

वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं.. इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो  बिन धागे की पतंग का हुआ...'

*"अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."*

*"धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं.!"*

*मकर संक्रान्ति की बधाई...*

Monday, January 9, 2017

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके

*एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !*
गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थीl
*क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।*
गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी , कि थोडी आराम कर लूँ , वैसे ही उसे याद आता कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगाl
गिलहरी फिर काम पर लग जाती !
गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी, तो उसकी
भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं , पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !

*ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !*

ऐसे ही समय बीतता रहा....
एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !

*गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?*

पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !

*यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !*

इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
*60 वर्ष की उम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता हैl*

तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -
*कितनी इच्छायें मरी होंगी ?*
*कितनी तकलीफें मिली होंगी ?*
*कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?*

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक  बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका
भोग खुद न कर सके !

*इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।*

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त
रहो सदा स्वस्थ रहो।

*BUSY पर BE-EASY भी रहोl*

Saturday, December 31, 2016

समझ में नहीं आता कि दोनों में साधु कौन है

गुणों  की  धारणा  ही   सच्चा  श्रृंगार  है  ... 

→ एक साधु नदी किनारे, धोबी के कपड़े धोने के एक पत्थर पर खड़े - खड़े ध्यान करने लगे । इतने में धोबी गधे पर कपड़े लादे वहाँ आया । उसने साधु को देखा तो प्रतीक्षा करने लगा कि धुलाई के पत्थर से साधु हटे और वह अपना काम शुरू करे । कुछ देर प्रतीक्षा करने पर भी जब साधु नहीं हटे तो उसने प्रार्थना की, महात्मा जी, आप पत्थर से हटकर खड़े हो जाएँ तो मैं अपने काम में लगूँ । धोबी की बात साधु ने अनसुनी कर दी

धोबी ने फिर प्रार्थना की किन्तु साधु ने इस बार भी ध्यान नहीं दिया ।  अब धोबी ने साधु का हाथ पकड़ कर धीरे से उन्हें पत्थर से उतारने की कोशिश की । धोबी द्वारा हाथ पकड़े जाने पर साधु को अपमान महसूस हुआ । उन्होंने धोबी को धक्का दे दिया । साधु का क्रोध देखकर धोबी की श्रद्धा भी समाप्त हो गई । उसने भी साधु को धक्का देकर पत्थर से हटा दिया ।
अब तो साधु और धोबी आपस में भीड़ गए । धोबी बलवान था अतः उसने साधु को उठाकर फेंक दिया । साधु भगवान से प्रार्थना करने लगा, हे भगवान, मैं इतने भक्ति - भाव से रोज आपकी पूजा करता हूँ फिर भी आप मुझे इस धोबी से छुड़ाते क्यों नहीं ? जवाब में साधु ने आकाशवाणी सुनी, तुम्हें हम छुड़ाना चाहते हैं किन्तु समझ में नहीं आता कि दोनों में साधु कौन है और धोबी कौन ? यह सुन साधु का धमण्ड चूर हो गया । उसने धोबी से क्षमा मांगी और सच्चा साधु बन गया ।

दरअसल वेश धारण करने से नहीं बल्कि सदगुणों को आचरण में उतारने से साधुता आती है ।

धन से सम्मपन्न होना तो सरल एवं सहज है लेकिन गुणों से सम्मपन्न होना मुश्किल है क्योंकि मनुष्य बुराइयों को छोड़ने और अच्छाइयों एवं गुणों को ग्रहण करने में अपने आपको कमजोर समझते हैं और इस कमजोरी के कारण गुणों को देखने के स्थान पर दूसरों के दोष देखने लगते हैं । इसका सीधा - सा मतलब है कि व्यक्ति अपनी कमी - कमजोरी छिपाने के लिए दूसरों की कमी को देखते हैं । इसलिए हर मनुष्य अमृतवेले उठते ही कोई भी एक अच्छा कार्य करने का संकल्प ले और रात को सोते समय एक बुराई का त्याग करके सोए । जो ऐसा करते हैं वे गुणग्राही बन जीवन को गुणों से सम्मपन्न बना लेते है ।

Saturday, December 17, 2016

दो ज़ीरो एक सात लिखो..


‘दो ज़ीरो
एक सात
लिखो..








लिखा ?









कैसे?







00 ऐसे?







गलत !





0

0




गलत !





  0

 





ये भी गलत !





0 0





ओह,फिर गलत !





सही उत्तर इस प्रकार है.. ‘2017’

कितनी उम्मीदों से पढ़ाया,सब पानी में गया !!!

😝😂😝😂😎
अरे.... नये साल के स्वागत की तैयारी करो।
*HAPPY NEW YEAR - 2017*
In advance..

Sunday, December 11, 2016

खाली हाथ आयें थे खाली हाथ ही जाना है।

एक पर्यटक एक एेसे शहर में आया, जो शहर उधारी में डूबा हुआ था।

पर्यटक ने 100 डॉलर होटल (जिसमे छोटा सा रेस्टोरेंट भी था) के काउंटर पर रखे और कहा मैं जा रहा हूँ कमरा पसंद करने।

होटल का मालिक फ़ौरन भागा कसाई के पास और उसको 100 डॉलर देकर मटन मीट का हिसाब चुकता कर लिया।

कसाई भागा गोट फार्म वाले के पास और जाकर बकरों का हिसाब पूरा कर लिया।

गोट फार्म वाला भागा बकरों के चारे वाले के पास और चारे के खाते में 100 डॉलर कटवा आया।

चारे वाला गया उसी होटल पर । वो वहां कभी कभी उधार में रेस्टोरेंट मे खाना खाता था।
100 डॉलर देकर हिसाब चुकता किया ।

पर्यटक वापस आया और यह कहकर अपना 100 डॉलर ले गया कि उसे कोई रूम पसंद नहीं आया ।

न किसी ने कुछ लिया,
न किसी ने कुछ दिया,
सबका हिसाब चुकता ।

बताओ गड़बड़ कहा है ?

It's only our misunderstanding that it's OUR money.

खाली हाथ आयें थे,
खाली हाथ ही जाना है।

Wednesday, December 7, 2016

बस पटरी पर सेल्फी लेनी थी

☎ट्रिंग ट्रिंग☎

लड़का ~ हेल्लो कौन?
लड़की ~ मैं पूजा और तुम कौन???

लड़का ~ मैं पूजारी
😂😂😂😂😂😂

☎ट्रिंग ट्रिंग☎

लड़का ~ हेल्लो कौन?
लड़की ~ मैं भकती और तुम कौन???

लड़का ~ मैं सकती
😂😂😂😂😂😂

☎ट्रिंग ट्रिंग☎

लड़का ~ हेल्लो कौन?
लड़की ~ मैं lakhsmi और तुम कौन???

लड़का ~ मैं कुबेर
😂😂😂😂😂😂

☎ट्रिंग ट्रिंग☎

लड़का ~ हेल्लो कौन?
लड़की ~ मैं पूनम और तुम कौन???

लड़का ~ मैं अमास
😂😂😂😂😂😂

पूजा के दौरान

माँ: अरे तुम्हें आरती याद है न?

बेटा : हाँ माँ, वो पतली सी, काली आँखों वाली, सुन्दर सी, शर्मा जी की बेटी, वही न?

माँ: कमबख्त, माता की आरती की बात कर रही हूँ।

😂😂😂😂😬😁😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂😂

😜😜😜😜😜😜
पति  अब तो मुझे शान्ति के साथ रहने दो

पत्नी आप शान्ति के साथ रहना चाहते हो तो

मुझे भी आनंद के साथ रहना हैं
😅😅😅😅😅😅😅😅😅

एक छोटे बच्चे ने अपनी माँ से कहा ,

माँ मैं इतना बड़ा कब हो जाउंगा की आप से बिना पूछे कहीं भी जा सकूं...?

माँ ने दिल को छु जाए ऐसा जवाब दिया....

बेटा इतना बड़ा तो तेरा बाप भी नहीं हुआ....😜😜

पत्नी: "अगर मैं खो गयी तो तुम क्या करोगे ?"

पति: "मैं अखबार में इश्तिहार दूंगा ।"

पत्नी: "तुम कितने अच्छे हो, क्या लिखोगे ?"

पति: "जिसको मिले उसकी "

😝😝😝😝😝😝😝😝😝😝

कितनी मोहब्बत है तुमसे....कोई सफाई नहीं देंगे,
साये की तरह रहेंगे तेरे साथ..पर दिखाई नहीं देंगे...!!!

😃😃😃
लड़की : पंजाब एक्सप्रेस कब आएगी ?

टीटी : पांच बजे |

लड़की  : लोकल ?

टीटी : नौ बजे |

लड़की : मालगाडी ?

टीटी : एक बजे, पर आपको जाना कहां है?

लड़की: कहीं नहीं,बस पटरी पर सेल्फी लेनी थी😂😝😆

लड़की (लड़के से): जब तुम लोग लड़की को प्रपोज
करते हो तो उनके हाथ क्यूं पकड़ लेते हो?
.
.
.
.
.
लड़का: बस अपनी हिफाजत के लिए कि कहीं कमीनी थप्पड़ ना मार दें.
😂😂😂😆😆😆😆😆😆😆😆

टीचर: तुमने कभी कोई नेक काम किया है?

पप्पू: हाँ सर.. एक बुजुर्ग आराम से घर जा रहे थे..

मैंने कुत्ता पीछे लगा दिया... जल्दी पहुँच गए..😂😃😜

Monday, December 5, 2016

*बुद्धिमान है तभी उसे दिखाई दी थी मैं मुर्ख हूँ*

एक राजा था उसके यहाँ एक दिन 2 दर्जी आये उन्होंने ने कहा की हम स्वर्ग से धागा लाकर पोशाक बनाते है जिसे देवता पहनते है राजा ने कहा एक पोशाक मेरे लिए बनाओ मुँह माँगा इनाम मिलेगा दर्जी ने कहा ठीक है 50 दिन का टाइम दो और इस पोशाक की एक खास बात है ये मूर्खों को नहीं दिखेगी राजा और भी खुश ऐसे तो हम अपने राज्य के मूर्खों की भी पहचान कर लेंगे दोनों ने पोशाक एक बंद कमरे में बनाना शुरू कर दी देर रात तक वो कटर पटर करते रहते थे एक दिन राजा ने मंत्री को भेजा कहा देखो कैसी पोशाक बन रही है मंत्री कमरे के अंदर गया जाते ही एक ने कहा देखो मंत्री कितना सुन्दर रेशा है पर मंत्री को कुछ दिखाई न दिया उसे वो बात याद आई की मुर्ख को ये पोशाक दिखाई न देगी मंत्री ने भी कहा हां बहुत सुन्दर है और आकर राजा को बताया बहुत सुन्दर बन रही है आपकी पोशाक, राजा बहुत खुश् हुआ एक दिन राजा भी गया देखने उसे भी कुछ न दिखाई दिया पर चुप रहा और मन में सोचा लगता मंत्री हमसे ज्यादा बुद्धिमान है तभी उसे दिखाई दी थी मैं मुर्ख हूँ इस प्रकार राजा चुप रहा पोशाक बनकर तैयार हो गयी दोनों दर्जियों ने कहा कल हम जनता के सामने ये पोशाक पहनाएंगे फिर राजा की सवारी निकलेगी दूसरे दिन राजा को पोशाक पहनाई गयी जो किसी को दिख नहीं रही थी पर बोला कोई नहीं,
...क्यों?
क्योंकि, मूर्खो को दिखती नहीं थी, इस डर से कि हमें सब मुर्ख कहेंगे, सब चुप रहे, राजा नंग धड़ंग होकर बड़ी शान से सवारी निकाल रहा था.